Red Paper
Contact: +91-9711224068
International Journal of Sanskrit Research
  • Printed Journal
  • Indexed Journal
  • Refereed Journal
  • Peer Reviewed Journal

Impact Factor (RJIF): 5.33

Peer Reviewed Journal

International Journal of Sanskrit Research

2026, Vol. 12, Issue 1, Part A

वेदनीय कर्म की प्रकृतिया

Sapana Ajit Parakh

इस लोक में हर जीव का लक्ष्य और चाहत एक ही है। सुख प्राप्ति और दुख मुक्ति। मगर चाहने के अनुसार ही कहाँ सब कुछ मिलता है। सुख और दुख आत्मा के उदय में आए कर्म अर्थात पुण्य-पाप के अनुसार प्राप्त होते हैं। जीव अपने विचारों और वासनाओं के अनुरूप अपना भाग्य निर्माण करता है। 'बुद्धिः कर्मानुसारिणा'- जैसे कर्म वैसे फल। बुरे कर्म असाता या दुःख रूप में फल देते हैं वहीं अच्छे कर्मों का साता या शुभ रूप में विपाकोदय होता है। आठ कर्मों में वेदनीय ऐसा कर्म है जिसका अनुभाव राग-द्वेष को बढावा देता है तथा जीव चौरासी लाख जीव योनियों में निरंतर भटकता रहता है। इस भटकन, इस चक्रव्यूह से निकलने कि लिए हमें बाहर से भीतर की ओर जाना होगा। भीतर उतरने के लिए कोई एक सहारा चाहिए। ज्ञान से खूबसूरत सहारा और भला क्या हो सकता है। ज्ञान भीतर उतरने के लिए सीढी है क्योंकि यह ज्ञान यानि यथार्थ ही हमारे चारों ओर व्याप्त है, बस हमें अपने भीतर के आवरण को हटाकर जागृत होने की आवश्यकता है । अप्पा सो परमप्पा" अर्थात आत्मा ही परमात्मा है। जिस प्रकार बीज ही वृक्ष है, दूध ही घी है उसी प्रकार आत्मा ही परमात्मा है। परंतु अनादि अनंत काल से आत्मा कर्म के वशीभूत होकर नाना गतियों में परिभ्रमण करती हुई जन्म मरण की चक्की में पिसती जा रही है। जब तक आत्मा के साथ कर्मों का मेल रहेगा तब तक संसार का खेल समाप्त नहीं होगा। अतः परमात्म स्वरुप को प्रकट करने के लिए कर्मों को समूल नष्ट करना आवश्यक है तथा कर्म से मुक्त होने के लिए कर्म के मर्म को समझना आवश्यक है। साता और असाता वेदनीय कर्म के दो पहलू हैं जिनके बीच संसार, जीवन और काल का चक्र घूमता रहता है। असाता से साता, दुःख से सुख, विषमता से समता, अज्ञान से ज्ञान और बंधन से मुक्ति की ओर अग्रसर होने वाली इस राह में वेदनीय कर्म और उसकी प्रकृतियों का अनोखा, अद्भुत, विलक्षण स्थान है।
Pages : 05-12 | 129 Views | 49 Downloads


International Journal of Sanskrit Research
How to cite this article:
Sapana Ajit Parakh. वेदनीय कर्म की प्रकृतिया. Int J Sanskrit Res 2026;12(1):05-12. DOI: 10.22271/23947519.2026.v12.i1a.2935

Call for book chapter
International Journal of Sanskrit Research
Journals List Click Here Research Journals Research Journals
Please use another browser.