सुदूरवर्ती देशों के संदर्भ में डॉ.हर्षदेव माधव का हाइकु काव्यसंसार
मुकेश कुमार वर्मा
वैश्विक परिदृश्य में ‘सुदूरवर्ती प्राचीन आर्यावर्त के पूर्व दिशा में अवस्थित ऐसे देश जो पूर्वी एशिया (जापान, द.कोरिया एवं चीन) तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया (थाईलैंड, वियतनाम तथा फिलीपींस) के अन्तर्गत सम्मिलित किए जाते हैं। इन देशों की संस्कृति तथा साहित्यिक स्रोत भारत की वैदिक तथा आर्य सभ्यता के साथ साम्यता रखते हैं। साथ ही भारत के रामायण-महाभारतकालीन एवं जेन-बौद्ध धर्म के विधि-विधान, संस्कृति, शास्त्रीय चिन्तन, काव्यात्मक अनुशासन, शब्दार्थ समूह की काव्य विधाएं, आध्यात्मिक ताना-बाना अथवा आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक संस्कार जंबूद्वीप की प्राचीन संस्कृति के साथ समन्वयवादी भाव रखती है। हाइकु का मूल स्वरूप भारत में गौतम बुद्ध द्वारा छठी शताब्दी में स्थापित बौद्ध धर्म में प्राप्त होता हैं, जिसका पहला रूप थेरवाद (वृद्ध या श्रेष्ठ जनों द्वारा प्रतिपादित धार्मिक नियम) या हीनयान बौद्ध धर्म (यह बुद्ध को साक्षात अवतारी पुरुष के रूप में मानकर पूजा करते हैं) था, जो बाद में महायान बौद्ध धर्म के क्रमिक विकास के रूप में परिवर्तित हुआ। भारत में पुष्पित पल्लवित होकर महायान शाखा बाद में सुदूर एशिया, जापान, चीन, दक्षिणी कोरिया, ताइवान, तिब्बत, भूटान, सिंगापुर तथा मंगोलिया देशों में फैल गई। जब महायानवादी विचार ने चीन में प्रवेश किया, तो भारतीय धर्म ने ताओवाद (चैथी शताब्दी में विकसित, चीन का एक मूल दर्शन जो बाद में बौद्ध धर्म के वज्रयान सम्प्रदाय के रूप में आगे बढ़ा और कन्फ्यूशीवाद के तŸवों को आत्मसात कर आगे बढ़ा और उसने चैन/ज़ेन बौद्ध धर्म में व्यावहारिक अभिव्यक्ति पाई। जापान में यही झेन “जापानी झेन”, वियतनाम में “वियतनामी टुक लैम”, तथा दक्षिणी कोरिया में “सिओन बुद्धिज़्म” के रूप में विकसित हुआ। गौतम बुद्ध ने मानव जाति को इस बात का बोध करवाया कि, उसे दो मानवीय अतिवाद से बचना चाहिए-पहला, स्त्री के कामुक भोग और दूसरा आत्म-पीड़ा। दो अतियों से बचने का एकमात्र उपाय ‘मध्यम मार्ग का अवबोध होना है। भारतीय गीता दर्शन में इसी को ‘स्थितप्रज्ञवाद’ कहा गया है। हाइकु के संबंध में सुदूरवर्ती देशों का संक्षिप्त इतिहास उत्तर आधुनिक संस्कृत साहित्य मे भविष्योन्मुखी शोध के बिंदुओं को स्पष्ट कर सकता है। इस शोध का उद्देश्य संस्कृत भाषा और साहित्य में हाइकु लेखन की समस्याओं और संरचना की जांच करना है, यह सच है कि जापानी हाइकु के बारे में पहले से ही कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पुस्तकें और लेख, दस्तावेज या तथ्य प्राप्त हुए हैं और ये स्रोत संस्कृत में हाइकु की संभावनाओं का उल्लेख करते हैं। हालाँकि, कोई भी वास्तव में संस्कृत और अन्य भाषा में प्रकाशित हाइकु का विश्लेषण और आलोचना नहीं करता है। संस्कृत भाषा में नवयुगदृष्टा एवं क्रांतिकारी डॉ. हर्षदेव माधव ने हाइकु को साहित्य की मुख्यधारा में प्रमुखता से स्थापित किया है। उनकी सभी व्यंग्यात्मक काव्य रचनाएं तथा काव्यात्मक टिप्पणियाँ आधुनिक संस्कृत वाङ्मय में हाइकु की नवीनता, मौलिकता तथा उपादेयता की ओर इशारा करती हैं।
मुकेश कुमार वर्मा. सुदूरवर्ती देशों के संदर्भ में डॉ.हर्षदेव माधव का हाइकु काव्यसंसार. Int J Sanskrit Res 2025;11(6):253-257. DOI: 10.22271/23947519.2025.v11.i6d.2880