वाल्मीकि प्रणीत रामायण भारत तथा विश्व साहित्य के एक अनुपम कृति है । रामायण के घटनाओं में पात्रों और कथावस्तु का वर्णन अत्यंत प्रभावशाली और चित्ताकर्षक बनाने के लिए विशेषणों का कुशलतापूर्वक उपयोग किया गया है । रामायण के सातों कांडों में राम के लिए प्रयुक्त अनेक विशेषणों का उल्लेख मिलता है ।
विशेषण एक महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्द है, जो व्यक्ति के गुणों का सौंदर्यपूर्ण वर्णन या विश्लेषण करने में सहायता प्रदान करता है । विशेषण शब्दों के द्वारा उनके गुणावली प्रकट होता है । रामायण में चारित्रिक गुणों का अलग अलग तरीके से प्रकाश करने के लिए अलग अलग विशेषण का प्रयोग प्रयोग किया गया है । इस रामायण में कहीं मर्यादा पुरुषोत्तम, तो कहीं प्रजाहितैषी, गुणवान, वीर्यवान, दृढ़ प्रतिज्ञ, चरित्रवान, पितृभक्त, धर्मभक्त, रिपुषुदन, रघुनंदन, श्रीराम, रघुपति, आयोध्याधिपति, दशरथनंदन, विश्वामित्रप्रिय, महाबाहु, महाबल, कृतज्ञ, सत्यसंध, सत्यवादी, धर्मज्ञ, शत्रुघ्न, वीर, क्षमाशील, सुंदर,आजानुवाहु आदि इन विशेषणों से राम के चरित्र का धार्मिक, सामाजिक,आध्यात्मिक, शारीरिक, नैतिक, सांस्कृतिक और मानसिक गुणों का वर्णन किया गया है, जो उन्हें एक आदर्श पुरुष और भगवान के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं ।
सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक दृष्टिकोण से राम का समाजहित, सेवाभाव, निष्ठा, सामाजिक समरसता, करुणा, सहानुभूति, आदर्शवादिता, सामाजिक न्याय, धर्म रक्षा, लोक कल्याण आदि गुणों का प्रमाण मिलता है जो आज भी प्रासंगिक है । अतः भारतीय परम्परा में विशेष चारित्रिक गुणावली के कारण श्रीराम को विश्वास और आस्था के प्रतीक माना जाता है ।