सेतुबन्ध महाकाव्य का महाकाव्यत्व और साहित्यिक महत्व
अमिता सिंह
सेतुबन्ध महाकाव्य महाराष्ट्री प्राकृत भाषा का अत्यन्त उत्कृष्टतम् महाकाव्य है, जिसे ‘रावणवहो‘ ‘दशमुखवध‘ के भी नाम से जाना जाता है। इसकी रचना प्रवरसेन द्वितीय ने तृतीय शताब्दी के मध्य वाकाटक वंश के राजा सर्वसेन के शासनकाल में की थी। यह कृति प्राकृत साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध हुई है। इस रचना के कारण प्रवरसेन का यश प्रभूत रूप से प्रसृत हुआ कि बाणभट्ट एवं दण्डी जैसे विद्वानों ने अपने ग्रन्थ में इसका उल्लेख किया है। इस महाकाव्य में कुल पन्द्रह आश्वास हैं। यह रामायण की कथा को जैन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है, जिसमें राम को एक आदर्श चरित्र के रूप में चित्रित किया गया है, जो अहिंसा और संयम के सिद्धान्तों का पालन करता है।