स्मृति ग्रन्थों में स्त्रीसङ्ग्रहण विषयक दण्डविधान
अनुपम पटेल
भारतीय संस्कृति के अनुसार जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता वास करते हैं - यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। निस्सन्देह स्त्रियों के विषय में पर्याप्त मात्रा में शोध हुए हैं। मानविकी के कई विषयों (यथा - समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत) में नारी विमर्श, नारी सशक्तिकरण महिला के अधिकार इत्यादि पर बहुतायत मात्रा में शोधग्रन्थ और शोधपत्र उपलब्ध हैं। परन्तु ‘स्त्रीसंग्रहण’ के विषय में अत्यल्प या यूं कहें कि न के बराबर कार्य हुआ है। हमारे देश में स्त्रियों से सम्बन्धित पर्याप्त नियम व कानून हैं, फिर भी आए दिन हम समाचार-पत्रों द्वारा आपराधिक मामलों से रूबरू होते रहते हैं। इसके प्रमुख कारणों में से एक प्रमुखतम कारण नियमों व कानूनों के जानकारी का अभाव भी है। यदि सभी व्यक्तियों को अपने नियम-कानून, अधिकार तथा दण्डविधान ज्ञात हों तो ऐसे आपराधिक मामलों की संख्या अवश्य कम हो सकती है। ऐसा नहीं है कि स्त्रीविषयक अपराध केवल आधुनिक समय में हो रहे हैं। प्राचीन ग्रन्थों यथा - धर्मशास्त्र, स्मृतियों, धर्मसूत्रों इत्यादि ग्रन्थों में स्त्रीसंग्रहण एवं उसके दण्डविधानों का उल्लेख है। इससे ज्ञात होता है कि स्त्रियों से दुर्व्यवहार या कभी-कभी स्त्रियों द्वारा परपुरुषों से संग्रहण हमेशा होता रहा है। प्रस्तुत शोध-पत्र के माध्यम से स्मृतिकालीन स्त्रीसंग्रहण के स्वरूप एवं स्त्रियों के अपराधों को रोकने हेतु किस परिस्थिति में कौन से दण्डविधान थे, इसका वर्णन किया गया है।