कुण्डलिनी योग एक व्यापक शब्द है। जिसके अन्तर्गत हठयोग एवं पातञ्जल योग दोनों का समावेश है। कुण्डलिनी योग का तात्पर्य है, कुण्डलिनी शक्ति क जाग्रत कर उसे अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचाना। कुण्डलिनी योग वस्तुत: हठयोग का ही स्वरूप है। कुण्डलिनी शक्ति का निवास स्थान मूलाधार चक्र है वहाँ से योग के विभिन्न अभ्यासों की सहायता से इस शक्ति को उर्ध्वगामी बनाकर सहस्रार में ले जाया जाता है। कुण्डलिनी शक्ति का सहस्रार में पहुँच जाना समाधि अवस्था का परिचायक है। सहस्रार में स्थित शिव तत्व से मिलन इस योग के समाधि की परमानन्द अवस्था का स्वरूप है। कुण्डलिनी योग के स्वरूप में इसके चरणों को धीरे-धीरे क्रमबद्ध ढ़ंग से विकसित किया जाता है। कुण्डलिनी योग को सहजता से समझने लिए योग का क्रमबद्ध अध्ययन करना आवश्यक है। कुण्डलिनी योग का मार्ग एक दुष्कर मार्ग है जिसके लिए गुरु का होना अति आवश्यक है। प्रस्तुत शोधपत्र में कुण्डलिनी योग के स्वरूप एवं इसके जागरण के विभिन्न अभ्यास को विद्वानों के अनुसार प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।