संस्कृत साहित्य में अर्वाचीन काल के महान कवि देवर्षि श्रीकृष्ण भट्ट का बहुमुखी योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे १७वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से १८वीं शताब्दी तक जयपुर, बूंदी और भरतपुर के राजदरबारों में प्रतिष्ठित कवि रहे। उन्हें “कविकलानिधि” तथा “रामरासाचार्य” की उपाधियाँ प्राप्त हुईं। उनका साहित्यिक अवदान संस्कृत और ब्रजभाषा दोनों में समान रूप से समृद्ध है। उनके प्रमुख संस्कृत ग्रंथों में ईश्वरविलास महाकाव्य, पद्यमुक्तावली, वृत्तमुक्तावली एवं रामगीतम् उल्लेखनीय हैं। ईश्वरविलास महाकाव्य कछवाहा वंश का प्रथम ऐतिहासिक महाकाव्य है, जिसमें पृथ्वीराज से ईश्वरीसिंह तक के राजाओं का जीवनवृत्त वर्णित है। रामगीतम् ग्रंथ में रामकथा को गीतगोविंद की शैली में प्रस्तुत किया गया है। वहीं वृत्तमुक्तावली में वैदिक, लौकिक और ब्रजभाषा छंदों का विशद विवेचन किया गया है। ब्रजभाषा में लिखित अलंकार कलानिधि एवं श्रृंगार रसमाधुरी जैसे ग्रंथों में काव्यशास्त्र की गूढ़ अवधारणाओं को सरल एवं सरस शैली में व्यक्त किया गया है। श्रीकृष्ण भट्ट के वंशजों ने भी साहित्य, तंत्र, संगीत एवं विद्वता के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण भट्ट का काव्य एवं विद्वता परक अवदान संस्कृत वाङ्मय की गरिमा को गौरवशाली बनाता है।