महाकवि श्रीहर्ष कृत महाकाव्य "नैषधीयचरितम्" की गणना बृहत्त्रयी के अंतर्गत की जाती है। इस महाकाव्य का मूल आधार ग्रन्थ महाभारत है । यह कथा महाभारत के वनपर्व के नलोपाख्यान से प्रेरित है। श्रीहर्ष ने उपदेशात्मक नलोपाख्यान की छः अध्याय की कथा को २२ सर्गों का महाकाव्य बनाकर अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया है, जिसमें समस्त शास्त्रों का समन्वय देखने को मिलता है । इसीलिए विद्वानों द्वारा "नैषधविद्वदौषधम्" उक्ति का प्रयोग किया जाता है । इस महाकाव्य से रसास्वादन के साथ-साथ ज्ञानार्जन भी किया जा सकता है। श्रीहर्ष का शब्द और अर्थ का सुन्दर समायोजन, छन्द, अलंकार रीति आदि के प्रयोग उल्लेखनीय हैं । अतः उपरोक्त महाकाव्य का काव्यशास्त्रीय दृष्टि से अध्ययन करना प्रस्तुत लेख का प्रयोजन है ।