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International Journal of Sanskrit Research
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International Journal of Sanskrit Research

2025, Vol. 11, Issue 4, Part B

छाया नाटकः एक आलोचनात्मक दृष्टि

मनीष पाण्डेय

संस्कृत ‘रूपक‘ शब्द का व्यवहार दृश्य काव्य के संदर्भ में समीचीन है जिसका विकास नितांत भारतीय परिवेश में रस, भाव और क्रिया के अभिनय के लिए हुआ है। नाटको की उत्पत्ति में रूपक के भेदो में छाया नाटक का निर्देश नहीं किया गया है किंतु छाया नाटकों की यथासमय रचना होती रही है, इस तथ्य से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है। भारतवर्ष में छाया नाटकों का समय नितांत असंदिग्ध रूप से निश्चित नहीं किया जा सकता किंतु संस्कृत में छाया रूपकों की परंपरा अधिक पुरातन नहीं स्वीकार की जा सकती। वस्तुतः छाया रूपक लोकनाट्य का सुसभ्य, सुसंस्कृत प्रतिनिधि है। भारतवर्ष के पश्चिम और उत्तर भाग के विभिन्न प्रांतो में आज भी यत्र-तत्र पुत्तलिका नृत्य का प्रचलन है जहाँ सूत्रधार डोरी के सहारे पुतलियो को नचाता है और उसके माध्यम से रोचक शैली में आख्यान का वर्णन करता है।
Pages : 112-114 | 580 Views | 154 Downloads


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How to cite this article:
मनीष पाण्डेय. छाया नाटकः एक आलोचनात्मक दृष्टि. Int J Sanskrit Res 2025;11(4):112-114. DOI: 10.22271/23947519.2025.v11.i4b.2724

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