महर्षि पतंजलि द्वारा रचित योगसूत्र भारतीय यौगिक ग्रथांे में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। योगसूत्र का विषय सैद्धान्तिक होने की अपेक्षा व्यावहारिक एवं क्रियात्मक अधिक है। योगसूत्र के अनुसार ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:‘ढेनचझ1 ढध्ेनचझअर्थात चित्त की वृत्तियांे का निरोध ही योग है। चित्तवृत्तियों के निरोध का फल ‘तदा द्रष्टु: स्वरूपेऽवस्थानम्’ढेनचझ2 ढध्ेनचझअर्थात तब दृष्टा (पुरूष) अपने स्वरूप मंे अवस्थित हो जाता है अर्थात जब दृष्टा (पुरूष) को प्रकृति (माया) से पृथक अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त हो जाता है तब वह अपने स्वरूप मंे प्रतिष्ठत हो जाता है। यह स्वरूप में प्रतिष्ठा ही कैवल्य या आत्मज्ञान या मोक्ष है। महर्षि पतंजलि ने अपने ग्रंथ योगसूत्र में चित्तवृत्तिनिरोध के तीन साधनों का वर्णन किया है। योगसूत्र में चित्तवृत्तिनिरोध के साधन अर्थात उपाय तीन प्रकार (उत्तम, मध्यम, अधम) के अधिकारीयों के लिए वर्णित किया गया है। साधक अपनी योग्यता के अनुरुप इन में से किसी एक साधन का चयन कर के अपने लक्ष्य कैवल्य या मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।