योगसाधना एक निवृत्ति का मार्ग है।प्रवृत्ति मार्ग भोगवादी होता है, जो मनुष्य को शाश्वत सुख प्रदान नही कर सकता। वह आपात रुप से इन्द्रियों को क्षणिक सुख तो प्रदान कर सकता है किन्तु अन्त में भोगवादी मार्ग दुखदायक व अन्धकार में ले जाने वाला ही होता है। इसलिए चिन्तनशील मनुष्य आपात रमणीय विषयों से भोगनिवृत्त होकर योगसाधना में प्रयत्नशील होते हैं। योग के निरन्तर अभ्यास से मनुष्य का शारीरिक, चारित्रिक,मानसिक,भावात्मक, बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास होता है। जिससे बैर भाव का नाश,परोपकार की भावना का उदय होकर मानव में नैतिकगुणों का प्रार्दुभाव होता है, जो उसे भ्रष्टाचार, आतंकवाद जैसी भयानक भावनाओं से उपर उठाकर विश्व शान्ति की ओर अग्रसर करते है।