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2019, Vol. 5, Issue 3, Part A

श्रीमद्भगवद्गीता में योग के अधिगम की अवधारणा

शशिकांत मणि त्रिपाठी, डाॅ. उपेन्द्र बाबू खत्री, डाॅ. अखिलेश कुमार सिंह, डाॅ. शाम गणपत तीखे

भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास करना है। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से विकसित मनुष्य ही मनुष्यता के गुणों से ओतप्रोत होगा। मानव जीवन का उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थ की प्राप्ति है। योग के अधिगम का लक्ष्य परम पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति है। मानव जीवन में अधिगम एक सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। अधिगम से तात्पर्य सीखने से है। मानवीय गुणों के अधिगम के बिना मनुष्य का निर्माण नहीं होता है। मनुष्य का देह धारण कर लेने मात्र से विवेक की प्राप्ति नहीं होती है। विवेक आत्मज्ञान से प्राप्त होता है। आत्मा का ज्ञान होने के पश्चात् ही मनुष्य विवेकवान होता है। विवेकशील मनुष्य ही सब में अपने को और सबको अपने में देखने की दृष्टि प्राप्त करता है। देखने की यह दृष्टि आत्मदर्शन के पश्चात् प्राप्त होती है। अध्यात्म के ज्ञान से जीवन के विषाद से मुक्ति मिलती है। दुःख की अत्यधिक निवृत्ति ही मोक्ष है, जिसकी प्राप्ति योग के अधिगम से संभव है।
प्रस्तुत शोध पत्र में गीता में योग के अधिगम के बारे में वर्णन किया गया है। जीवन में विषाद से मुक्ति अपने वास्तविक स्वरूप के बोध के साथ ही संभव है। देहात्म भाव से मुक्त होकर आत्म भाव में प्रतिष्ठित होना योग है। दृष्टा का अपने स्वरूप का अधिगम योग का अभीष्ट है। यह योग विद्या ही दृष्टा और दृश्य के संयोग से उत्पन्न अविद्याजनित मानसिक क्लेशों से मुक्ति दिलाती है। विद्या वह है जो मुक्ति दिलाएं (सा विद्या या विमुक्तये)।
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How to cite this article:
शशिकांत मणि त्रिपाठी, डाॅ. उपेन्द्र बाबू खत्री, डाॅ. अखिलेश कुमार सिंह, डाॅ. शाम गणपत तीखे. श्रीमद्भगवद्गीता में योग के अधिगम की अवधारणा. Int J Sanskrit Res 2019;5(3):15-17.
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