आगम (तंत्रसाधना) के प्रमाण सिंधुघाटी सभ्यता से लेकर ऋग्वेदिय, अर्थववेदिय ऋचाओं, उपनिषदों, पुराणा,ें तांत्रिक गं्थों और हठयौगिक गं्रथों आदि में स्पष्ट देखा जा सकता है। आगम से तात्पर्य उस ज्ञान से है जो गुरू हिृ€न्न्ाष्य परम्परा से आया हुआ है। इसे सामान्य अर्थाें में नही लिया जा सकता यह ज्ञान सद्गुरू के बिना जानना संभव नही है। तंत्र साधना बाह्य पूजा से आरंभ होकर शरीर की आंतरिक शक्तियों पर को जागृत कर समस्त बन्धनों से मुक्त कर, अतीन्द्रिय ज्ञान की अनुभूति कर लेते है। यही ज्ञान ही आगम कहलाता है। इस आगम साधना के प्रवर्तंक तंत्राधिपति-मंत्राधिपति हिृ€न्न्ाव को माना जाता है। भारतीय आगमिक तंत्रों के अनुसार आगम Â(तंत्रÂ) का ज्ञान प्रथमत: हिृ€न्न्ाव से पार्वति को प्राप्त हुआ। आगम साधना को बाद में तंत्र साधना के रूप में जाना जाने लगा। समयांतराल में इन आगमिक साधना को सर्वत्र प्रचार-प्रसार के निमिईन्न्ा हिृ€न्न्ाव से ऋषि दुर्वासा को आदेहृ€न्न्ा प्राप्त हुआ। दुर्वासा ने तंत्र साधना की द्वैत, द्वैताद्वैत और अद्वैत मार्गी साधनाओं के प्रचार के लिए त्र्यंबक, आमर्दक और श्रीनाथ को नियुक्त किया। इस प्रकार तंत्र के इस गूढ़ साधनाओं का आरंभ गुरू के निर्देहृ€न्न्ाों से विहृ€न्न्ोष स्थानों, निर्जन क्षेत्रों, गुफाओं, हिृ€न्न्ाक्तिपीठों- कामरूप, उड्डियान, जालंधर आदि स्थानों में होने लगे। इन तांत्रिक परम्पराओं मंे शैव, शाक्त, वैष्णव आदि सम्प्रदाय सबसे पुराने माने जाते है। साथ ही सौर, गाणपत्य, कौलमार्ग, स्मार्त आदि प्रमुख थे। शैव परम्पराओं के अंतर्गत पाÂँचवी-छठवी ई.पू. श्रीकंठ प्रविईन्नर््ात पाहृ€न्न्ाुपत मत के उपरांत कालामुख, कापालिक, माहेहृ€न्न्वर, नाथ सम्प्रदाय आदि शाक्तों में मनसादेवी पार्वती, दुर्गा, अर्द्धनारिहृ€न्न्वर, दसमाविद्याऐं, श्रीविद्या आदि वैष्णवों में बैखानस, पांचरात्र, हरिहर आदि तांत्रिक परम्पराऐं प्रमुख थे। उपरोक्त तांत्रिक साधनाओं में से कुछ परम्पराओं को विभिन्न साधना परम्पराओं ने अपने साधनाओं में स्थान देने लगे थे। इनमें प्रमुख रूप से बौद्ध तांत्रिक परम्पराऐं सम्मिलित थे। तांत्रिक बौद्ध परम्परा से तात्पर्य बौद्ध साधकों का वह समुदाय जो बुद्धत्व की प्राप्ति तंत्र साधनाओं से किया करते थे। तांत्रिक बौद्धों का उद्घोष था कि उद्देहृ€न्न्य बुद्धत्व की प्राप्ति है। इस प्रकार तांत्रिक साधनाओं को स्वीकार करएक सम्प्रदाय का रूप ले लिया जो महायानी कहलाये कालांतर में इनके अनेक सम्प्रदायों का विकास होता गया जिनमें मंत्रयान, वज्रयान, सहजयान, कालचई˜यान आदि सम्प्रदाय प्रमुख है। इन तांत्रिक बौद्ध परम्पराओं के द्वारा अपनी साधनाओं और अनुभूतियों को साहित्यिक रूप प्रदान करने का प्रयास जारी रहा जिनमें इन महायानी बौद्धों ने अपने रचनाओं में हिंदू देवी, देवताओं के समान ही देवी और देवताओं व सिद्ध पुरूषों की पूजा का विधान, उपनिषदिक ध्यान पद्धतियों को अपनाना, अवलोकितेहृ€न्न्वर पूजा, हिृ€न्न्ाव-हृ€न्न्ाक्ति के समान वज्र-वारिही का स्वरूप को आदहृ€न्नर््ा मानना, आसन,प्राणायाम, शरीरस्थ चई˜ का जागरण व महासुखावस्था आदि बौद्ध धर्म के अनुरूप दहृ€न्नर््ान प्रस्तुत करने लगे थे। इन तंात्रिक बौद्ध परम्पराओं के द्वारा संस्कृत, मिश्र संस्कृत, अपभ्रंहृ€न्न्ा, तिब्बती, नेवारी आदि लिपि में रचनाऐं प्रकाहृ€न्न्ा मंे आती गयी। इन मध्यकालीन तांत्रिक सिद्धों की साधनाओं व सिद्धियों ने भारत के बाहर नेपाल, तिब्बत आदि देहृ€न्न्ाों की साधनाओं में अपना स्थान बना लिया था।
उमाषंकर कौषिक, डाॅ. उपेन्द्र बाबू खत्री, डाॅ. यतीन्द्रदत्त अमोली. भारतीय आगमिक परम्पराओं का तांत्रिक बौद्ध परम्पराओं पर प्रभावः एक समीक्षात्मक परिचय. Int J Sanskrit Res 2018;4(6):03-06.