Contact: +91-9711224068
International Journal of Sanskrit Research
  • Printed Journal
  • Indexed Journal
  • Refereed Journal
  • Peer Reviewed Journal

Impact Factor (RJIF): 8.4

International Journal of Sanskrit Research

2017, Vol. 3, Issue 5, Part C

संस्कृत महाकाव्यों में समाज, धर्म एवं दर्शन

Dr. Arun Kumar Porel

वर्तमान युग में समाज, धर्म और दर्शन की व्याख्या मनुष्य के लिए ग्राह्य होने के साथ-साथ भारतीयता के आत्म-गौरव की परिचायिका है। वर्तमान परिपे्रक्ष्य में भारतीय समाज, धर्म एवं दर्शन की विमुखता के कारण आस्था प्रश्न चिह्न के रूप में परिणत हो रही है परन्तु अन्तःकरण में विद्यमान मानव का दिव्यत्व उसे निःश्रेयस-सिद्धि हेतु पे्ररित करता है। यथा गीता में कहा है-
यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस्सिद्धिः।
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मानः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।
यद्यदात्मनि चेच्छेत् तत्परेस्यापि चिन्तयेत्।
आत्मानः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।
Pages : 149-151 | 572 Views | 211 Downloads
How to cite this article:
Dr. Arun Kumar Porel. संस्कृत महाकाव्यों में समाज, धर्म एवं दर्शन. Int J Sanskrit Res 2017;3(5):149-151.
International Journal of Sanskrit Research

International Journal of Sanskrit Research


Call for book chapter
International Journal of Sanskrit Research
Journals List Click Here Research Journals Research Journals
Please use another browser.