शिक्षण कौशल विकास में श्रीमद्भगवद्गीता की उपयोगिता
डा0 प्रेमप्रकाश पुरोहित
किसी भी राष्ट्र की उन्नति उस राष्ट्र के कुशल, ईमानदार, योग्य एवं कौशलपूर्ण नागरिकों के द्वारा होता है यदि राष्ट्र के सभी नागरिकों को उनकी रूची, क्षमता, योग्यता के अनुसार व्यवसाय मिलता है और व्यवसाय से संबन्धित कौशलों का विकास होता तो उनके कार्यों की उत्पादकता बढ़ती है। इससे उस राष्ट्र के सभी नागरिकों का जीवन स्तर उठता है। इसके लिए देश के सभी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानो में श्रीमद्भगवद्गीता की व्यवस्था करना आवश्यक है, तभी प्रत्येक व्यक्ति तथा समाज के लोग कौशलपूर्ण जीवन के साथ अपनी अभिवृति एवं अभिरूचि के अनुसार कार्य कर पायेगें जिससे समाज का संतुलित विकास होगा। इसके लिए प्रत्येक नागरिक को शिक्षा, व्यवसाय, जीवन प्रबन्ध, जीवन दर्शन, सामाजिक, सांस्कृतिक, मानोवैज्ञानिक रूप से कौशलपूर्ण शिक्षा की आवश्यकता है जिससे वे शारीरिक, मानसिक, एवं संवेगात्मक रूप से खुद को सामथ्र्यवान एवं कार्य में कुशलता का प्रयोग करेगें। जिससे प्राचीन मूल्यों के प्रति आस्था का दृष्टिकोण विकसित होगा और वर्तमान समाज द्वारा निर्मित मूल्यों को अपना कर वर्तमान तथा प्राचीन मूल्यों के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकेंगे। इसके लिए सामाजिक, दार्शनिक, शैक्षिक, व्यावसायिक रूप मंे अधिक से अधिक विकास करेंगे तथा समाज के साथ समायोजन करने की भावना एवं दृष्टिकोण का विकास कर पायेंगे। व्यक्तित्व विकास के लिए भौतिक विकास के साथ आध्यात्मिक विकास होना भी अति आवश्यक है। इसलिए श्रीमद्भगवद्गीता में विद्यमान कौशल विकास की उपयोगिता का अध्ययन किया जाना अति आवश्यक है। इससे कई महान शिक्षकों ने प्रेरणा ली। जो इस प्रकार हैः-
महात्मा गांधीः जब मुझे शंकायें घेरती हैं, निराशाएँ मेरा सामना करती हैं और मुझे आकाश-मण्डल पर कोई ज्योति की किरण दृष्टिगोचर नहीं होती, उस समय मैं गीता की ओर ध्यान देता हूं। उसमें कोई न कोई श्लोक मुझे शांतिदायक अवष्य मिल जाता है और घोर शोकाकुल अवस्था में मैं तुरन्त मुस्कराने लगता हूं। मेरा जीवन बाह्य-दुःखपूर्ण घटनाओं से पूर्ण है और यदि उनके प्रत्यक्ष एवं अमिट कोई चिन्ह मुझ पर नहीं रह गये हैं ता इसक श्रेय श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेशों का ही है।
डा0 राधाकृष्णन के अनुसार: भगवद्गीता जीवन के सर्वोच्च लक्ष्यों को हृदयंगम करने में सहायता देती है।
श्री अरविन्द घोष के अनुसार: गीता ग्रन्थ आध्यात्मिक ग्रन्थ है यह मानव को उसके स्तर से ऊंचा उठाती है और मानव विपत्तियों में भी तुरन्त मुस्कराने लग जाता है।
स्वामी विवेकानन्द: विवेकानन्द ने गीता को अपने जीवन व्यवहार में उतारा था। पूर्व राष्ट्रपति डां0 अब्दुल कलाम भी गीता को प्रेरणा दायक ग्रन्थ मानते हैं। दरसल गीता जीवन के यर्थात् रहस्यों को सुलझाती है। इसमें सारे जीवन के रहस्य का सार छिपा है। श्रीमद्भगवद्गीता द्वापर युग में महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया ज्ञान है। शताब्दियां बीत जाने के बाद भी इसकी प्रासांगिकता और उपयोगिता वैसी की वैसी बनी हुई है। क्योंकि उस वक्त की समस्याएं और परिस्थियां हर युग में बनती आई हैं। आज के इस संघर्षमय जीवन में तो गीता की उपयोगिता और बढ़ गयी है। क्योंकि यह उलझनों से किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुके मानव को जीवन जीने का सही रास्ता दिखलाती
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता में निहित तत्वों का वर्तमान में निर्देशन एवं परामर्श प्रणाली में उपयोगिता के सिद्धान्तांे एवं आदर्शों का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पालन किया जायेगा तो समाज में नैतिक, समानता एवं उच्च आदर्शो की स्थापना करने में सहायता मिलेगी। गीता में विद्यमान निर्देशन एवं परामर्श को व्यक्ति के पूर्ण विकास हेतु व्यवहारिक रूप दिया जायेगा तो सम्पूर्ण समाज में प्रत्येक व्यक्ति एक आदर्श एवं उत्तम नागरिक बनेगा। जिससे सम्पूर्ण विष्व में उत्पन्न हो रही सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, एवं मनोवैज्ञानिक समस्यायें स्वतः ही हल हो जायेगीं।