व्याकरणशास्त्र में काशिकावृत्ति का स्थान एवं वैशिष्ट्य
उमेश पौडेल
संस्कृत वाङ्मय में ' व्याकरणशास्त्र ' का अपना विशिष्ट स्थान है। व्याकरण वैदिक काल में हीएक स्वतन्त्र विषय बन चुका था। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद के बहुत से मन्त्रों में शब्दो की व्युत्पत्ति धातु तथा अर्थ के साथ की गई है। वेदों की सुरक्षा के लिए प्राचीन काल से ही व्याकरण की गणना षड् वेदाङ्गो में की गई है। न केवल गणना की गई है अपितु - मुखं व्याकरणं स्मृतम् 1 कहकर इसे सर्वश्रेष्ठ अंग की संज्ञा दी गई है। नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात-व्याकरण ये चार आधारभूत तथ्य यास्क (ई.पू. लगभग 700) के पूर्व ही व्याकरण में स्थान पा चुके थे। सम्प्रति संस्कृत व्याकरण के अध्ययन की दो शाखाएं प्रचलित हैं नव्य व्याकरण तथा प्राचीन व्याकरण । काशिकावृत्ति प्राचीन व्याकरण शाखा का ग्रन्थ है। इसके सम्मिलित लेखक जयादित्य और वामन हैं। यह पाणिनीय अष्टाध्यायी पर सातवीं शताब्दी ईस्वी में रची गयी प्रसिद्ध रचना है। इसमें बहुत से सूत्रों की वृत्तियां और उनके उदाहरण पूर्वकालिक आचार्यों के वृत्ति ग्रंथों से भी दिए गए हैं। केवल महाभाष्य का ही अनुसरण न कर अनेक स्थलों पर महाभाष्य से भिन्न मत का भी प्रतिपादन हुआ है। कोशिका में उीृत वृत्तियों से प्राचीन वृत्तिकारों के मत जानने में बडी सहायता मिलती है, अन्यथा वे विलुप्त ही हो जाते। इसी प्रकार इसमें दिए उदाहरणों से कुछऐसेऐतिहासिक तथ्यों की समुपलब्धि हुई है जो अन्यत्र दुष्प्राप्य थे। इस ग्रन्थ की अनेक विशेषताओ में एक विशेषता यह भी है कि इसमें गणपाठ भी दिया हुआ है जो प्राचीन वृत्ति ग्रन्थों में नहीं मिलता। अत: हम कह सकते हैं कि व्याकरणशास्त्र में काशिका का सर्वप्रमुख स्थान है।