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International Journal of Sanskrit Research
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International Journal of Sanskrit Research

2016, Vol. 2, Issue 6, Part D
भारतीय संस्कृति में नैतिकता एवं धर्म

डाॅ॰ देव निरंजन झा

भारतीय संस्कृति की धर्म अ©र नैतिक दृष्टि से सबल भूमिका है। जनमानस की चेतना में विद्यमान धर्म, वह धारणा है, ज¨ शाश्वत रूप में चैतन्य है अ©र जिसका कभी पराभव एवं तिर¨भाव नहीं ह¨ता। धर्म नैतिक दृष्टि का उद्घाटन करता है। नीतिजन्य भाव से उत्पन्न नैतिकता का आशय है, कि जीवन में संयम अ©र नियम के साथ आचार क¨ जीवन्त रखना। अतः धर्म का नैतिकता के साथ इसलिए भी प्रगाढ़ सम्बन्ध ह¨ जाता है, कि वह व्यक्ति क¨ नीतिधारण करने की प्रेरणा देता है। वस्तुतः धर्म यदि आचरण है, त¨ नैतिकता उसका उपनेत्र्ा है। यह उपनेत्र्ा ही जीवन क¨ संयमित करने की दिशा देता है। कवि मूलतः अपने काव्य संरचनाकाल में धर्म अ©र नैतिक द¨न¨ं ही दृष्टिय¨ं से सम्बद्ध रहता है। अतः उसका सहज स्वाभाविक चिन्तन धर्म अ©र भी नैतिकतापूर्ण ह¨ जाता है। भारतीय संस्कृति धर्म एवं नैतिकता क¨ ल्¨कर चली है, उसका ध्येय है परमार्थ रूप में मानव का कल्याण। भारतवर्ष विश्वकल्याण की कामना से अभिप्रेत ह¨ने के कारण जगद्गुरु के सिंहासन पर अधिरूढ़ हुआ है।
Pages : 202-204 | 8 Views | 2 Downloads
How to cite this article:
डाॅ॰ देव निरंजन झा. भारतीय संस्कृति में नैतिकता एवं धर्म. Int J Sanskrit Res 2016;2(6):202-204.
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