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International Journal of Sanskrit Research
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International Journal of Sanskrit Research

2016, Vol. 2, Issue 6, Part C
आयुर्वेदः आधुनिक आयुर्विज्ञान का आधार

डाॅ. आयुष गुप्ता

प्राचीन चिकित्सा पद्धति का महत्व तब स्पष्टतया परिलक्षित होता है, जब आधुनिक आयुर्विज्ञान की औषधियाँ अपने अतिरिक्त प्रभाव (Side effects) तथा रोगों के मूल को नष्ट करने में यदा-कदा असफल हो जाती है। वास्वत में प्राचीन चिकित्सा पद्धति रोग के मूल को पहचान कर उसका निदान प्रारम्भ करती है। आयुर्वेद, आधुनिक आयुर्विज्ञान की तरह तन्त्रिका-तन्त्र (Nervous System) पर प्रभाव डालकर रोग का अल्पकालीन समाधान नहीं करता। आधुनिक आयुर्विज्ञान पद्धति सभी प्रकार के शारीरिक तापवृद्धि अथवा दर्द के लिए पैरासीटामोल (Paracetamole) जैसी औषधियों का प्रयोग करती है, जो कि वास्तविक समस्या पर प्रभाव न डालकर तन्त्रिका तन्त्र के उस भाग पर प्रभाव डालती है, जिनसे तह अंग नियन्त्रित होता है। यह औषधि तत्काल दर्द निवारक सिद्ध होती है किन्तु वास्तविक या मौलिक समस्या का समाधान न होकर किडनी तथा आमाशय (lever) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 
आयुर्विज्ञान की सभी औषधियाँ अम्ल (Acid), क्षार (Base) तथा लवण (Salt) पर आधारित होती है। इन सभी का आधार प्रकृति (Nature) ही है। यथा यदि किसी औषधि में एल्कोहल (C2H5OH, C3H7OH आदि) है तो इसका निर्माण प्रकृति में प्राप्त होने वाले पेड़-पौधों/फलों आदि के रस (Juice) के किण्वन (Fermentation) द्वारा ही होता है। सभी रासायनिक अम्ल, क्षार तथा लवण मूल प्रकृति से ही प्राप्त होते हैं जैसे CH4 मीथेनद्ध, धान के खेत में अधिकता से प्राप्त होती है। आयुर्वेद के समय औद्योगिकीकरण का अभाव या, अतः इन प्राकृतिक तत्वों का सीधा उपयोग औषधि के रूप में किया जाता था। रोगशमन का एक सीधा सिद्धान्त आयुर्वेद तथा आयुर्विज्ञान दोनों में प्रचलित है अम्ल की अधिकता यदि शरीर में है तो क्षारीय औषधि, एवं ठीक इसका व्युत्क्रम। आयुर्वेद में वात, पित्त एवं कफ का असन्तुलन रोग का कारण है। वात, पित्त, कफ सामान्य तौर पर अन्य कुछ न होकर पदार्थ की तीन अवस्थाएं ठोस, द्रव तथा गैस ही हैं। 
इस प्रकार प्राचीन आयुर्वेद, को रोगनिदान की प्रक्रिया रोग परीक्षण (Diagnosis) की विधियों एवं आधुनिक औषधियों की प्रकृतिमूलकता के कारण आयुर्विज्ञान का आधार सिद्ध किया गया है। इसके साथ-साथ आयुर्विज्ञान की अतिरिक्त प्रभावकता (Side effects) एवं तन्त्रिका तन्त्र पर नकारात्मक प्रभावों जैसी सीमाओं को स्पष्ट करते हुए आयुर्वेद का महत्त्व स्पष्ट किया गया है।
Pages : 131-133 | 879 Views | 146 Downloads
How to cite this article:
डाॅ. आयुष गुप्ता. आयुर्वेदः आधुनिक आयुर्विज्ञान का आधार. International Journal of Sanskrit Research. 2016; 2(6): 131-133.
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